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Science and Technology
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शरीर को नहीं आत्मा को सजाएँ | हमारी मानसिकता बाहरी आडम्बर की और अधिक आकर्षित होती है बनिस्बत आत्मा की सुंदरता के | एक मधुमक्खी अपनी मृत्यु के पश्चात अपने जीवन काल में स्वयं के द्वारा एकत्रित किया गया बहुमूल्य शहद छोड़ जाती है किन्तु फिर भी तितली को पसंद किया जाता है | किसी कारणवश आप Maharishi Ved Vigyan Prakashan के पूर्व प्रकाशित अंक पढ़ने से वंचित रह गए हो तो आप वह अंक पुनः प्राप्त कर सकते है | http://bit.ly/gyan-ki-gagar

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वैदिक बाड्मय के चालीस क्षेत्रो को परमपूज्य ब्रह्मलीन महर्षि महेश योगी जी ने दीर्घ अंतराल के पश्चात एक बार पुनः गठित और मूल स्वरूप में स्थापित किया |
सम्पूर्ण वैदिक वाड्मय के इस व्यवस्था क्रम में चारो वेद, छः वेदांग, छः उपांग, नौ संहिताओं सहित उपवेद, आयुर्वेद, गान्धर्ववेद, स्थापत्यवेद, और धनुर्वेद, ब्राह्मण ग्रंथो के समूह में इतिहास, पुराण, स्मृति, उपनिषद, आरण्यक, ब्राह्मण और प्रतिशाख्यों में छः प्रातिशाख्य हैं |
''आदिरन्तनसहेता'' सिध्दान्त के अनुसरण में वेद विज्ञान के सभी चालीस क्षेत्रो की उपलब्ध संहिताओं एवं ग्रंथो के प्रथम और अंतिम ऋचा, मंत्र, श्लोक अथवा सूत्र का संग्रह इस किताब में किया गया हैं |

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महर्षि भावातीत ध्यान परिचय, लाभ एवं पध्दति !!
परम पूज्य महर्षि महेश योगी जी द्वारा प्रणीत भावातीत ध्यान कार्यक्रम का संक्षिप्त परिचय यहाँ दिया जा रहा है | महर्षि महेश योगी जी ने ५८ वर्ष पूर्व प्राचीन वैदिक परम्परा - प्रकृति के विधान की पूर्ण एवं कालातीत ज्ञान की परम्परा से सम्पूर्ण विश्व को भावातीत ध्यान का उपहार प्रदान किया | उन्होंने चेतना के पूर्ण विज्ञान को मानव जीवन एवं समाज के पूर्ण विकास के लिए प्रत्यक्ष अनुभव एवं वैज्ञानिक समझ के व्यावहारिक स्तर पर इसे पुर्नजीवित किया |

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" योग विद्या मानव जीवन के ऊधर्वगामी विकास और जीवन के परम लक्ष्य-मोक्ष की प्राप्ति अत्यन्त सहजता से कराने वाली विद्या है | यह विद्या पूर्णतः वैज्ञानिक, स्वाभाविक, प्राकृतिक और असीमित आनंददायी हैं | योग विद्या अपने विश्व परिवार को सदैव सुख, समृध्दि, शांति प्रदान कर विश्व की सामूहिक चेतना को सतोगुणी और एकीकृत बनाये रखेगी | " -महर्षि महेश योगी
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